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Sunday, 10 January 2016

मनुष्य की नियति का समय - राकेश रोहित

आलेख
संदर्भ: भुवनेश्वर की कहानी 'भेड़िये'

('भेड़िये' पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की 'हंस', मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी "नयी कहानी की पहली कृति 'भेड़िये' ” से आरंभ बहस के क्रम में 'बीच बहस में' 'हंस' सितंबर, 1991 में "मनुष्य की नियति का समय" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. 'हंस' के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी "भेड़िये और भेड़िये" में डा. शुकदेव सिंह  ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में 'संदर्श' के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में 'हंस' से साभार प्रकाशित हुई थी.) 


भुवनेश्वर

भुवनेश्वर  की  भेड़िये’  कहानी को वहां से समझा जाना  चाहिए जहां यह मनुष्य की नियति के समय को पकड़ने के क्रम में वैयक्तिक त्रासदी को मानवीय महात्रास में बदल देती है.  इफ्तखार के बहाने एक पीढ़ी या कहिये एक वर्ग के उस जीवन दर्शन को समझा जा सकता है जिससे वह अपनी नियति को उस समूह की नियति से अलग कर लेता है जो समान रूप से उसकी भी है. इस तरह वह एक अंतर्विभाजन रचता है और चीजों की प्राथमिकता उनकी उपयोगिता से तय करता है. यहीं से कुछ को कुछ से कमतर और कुछ को कुछ से बेहतर समझने की मानसिकता जन्म लेती है जिसके अधीन वह टिप्पणी करता है- पूरे बंजारों में उसका गड्डा अफसर था. यह एक असमानता का श्रेष्ठवादी दर्शन है जहां भेड़िये के खिलाफ लड़ाई को वह अपने बचे रहने की जद्दोजहद से जोड़ता है. तब उसे बैल उतने ही चाहिए जो गाड़ी दौड़ा ले जा सकें, नटनियां तभी तक जब तक वह गाड़ी पर बोझ न हों. यहीं कहीं वह उस प्रेम को नकारता है जिसे उसने एक क्षण बचा रखा था और बादी के बदले दूसरी  नटनियां को कूदने के लिये कहा था. यह एक किस्म की प्रतिहिंसा थी जो हिंसा को जन्म देती है. वह प्रेम को उसके सिरे से नकारने की चेष्टा करता है, "तुम खुद कूद पड़ोगी या मैं तुम्हें धकेल दूं." और नटनियां उसी तर्ज पर चांदी की नथ उतार कर बाहों से आंखें बंद किये कूद जाती है. दरअसल यह प्रेम का वह ठहरा हुआ खास क्षण है जो इस नष्ट होते समय में बचा है. इफ्तखार को शायद शंका होती है कि बादी को वह कूदने के लिये नहीं कह सकेगा या शायद बादी ही उस पर भरोसा किये हो कि वह उसे बचा लेगा. इस तरह प्रेम उसके अन्दर की कमजोरी बन जाता है जो उसके अपने होने की शर्त  के विरुद्ध जाता  है. वह इससे निजात पाने के लिये अपनी झिझक के ऊपर यह कहने का साहस करता है, "तुम खुद कूद पड़ोगी या ...." यह एक क्रूर किस्म का व्यक्तिवाद है. बादी इसका प्रत्युत्तर है. वह चांदी की नथ उतारकर उसके हाथों में दे देती है जैसे आभास दे रही हो कि वह इसी के लिये रुकी थी. इस तरह वह अपने अन्दर के प्रेम का अंत करती है और बाहों से आंखें बंद किये अपनी नियति को स्वीकृत करती है. वह इफ्तखार के पिता की तरह कोई निर्देश नहीं देती कि वह उसके मरने के बाद उसके जूते नहीं पहने यद्यपि वो नये हैं. बादी का यह कूद पड़ना रीतिकालीन प्रेम के उत्सर्ग की नैतिकता नहीं रचता है. बल्कि एक झटके से वह अपनी उस स्थिति का संकेत करती है जो उस वक्त उसकी है और जिस असमान नैतिकता ने प्रेम का अंत कर दिया है जैसे प्रेम था ही नहीं.

पर नियंता होने के दंभ ओढ़े इफ्तखार अपनी नियति को स्वीकार नहीं करता, वह अपने को 'एलियनेट' करता है. धीरे-धीरे वह सबको अपने से काटता है और एक खोखला आश्वासन ओढ़े रहता है कि अगर जिन्दा रहा तो  मैं एक-एक  भेड़िया काट डालूंगा. यह उसका आत्मस्वीकार है कि सारा व्यापार मात्र उसके जिन्दा रहने के लिये है. इफ्तखार कूद पड़ता है कि उसकी जिंदगी थोड़ी है. वह अपने अस्तित्व को 'डाइल्यूट' कर जिंदगी को एक यूनिट बनाता है. और मृत्यु को विवश अंगीकार करता है क्योंकि उसकी जिंदगी अपने बेटे की जिंदगी से 'श्रेष्ठ' नहीं है. वह अपने रचे दर्शन से अपनी स्थिति को परिभाषित करता है और पाता है. यही वह क्षण है जहां आप त्रास रचते भी हैं और उसमें शामिल भी होते हैं. धीरे-धीरे वह सारा अंतर मिट जाता है जो आपमें था, जो आपमें नहीं है. इफ्तखार के पिता में जीने का मोह था और बहाना भी. वह बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था. वह अपने भाव की दुनिया रचता है - मारते-मरते मैं कह चलूंगा खारे-सा-खरा कोई निशानेबाज नहीं है. वह अपने जूते को लेकर कहता है, अगर मैं जिन्दा रहता तो दस साल और पहनता. इस तरह दस साल वह संबंध  और रहता जो खरे और उसके बाप के बीच था. लेकिन इफ्तखार के पिता ने खुद को न्यूनीकृत कर लिया.

इफ्तखार अपने सतत 'एलियनेशन' से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे 'खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता हैनटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, "भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे." इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है 'जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं'. यह संवेदना का एक 'क्लोज सर्किट' है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.  
      
पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के बाद खारु में बदल जाता है. यह उसकी उस छद्म वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.

Monday, 28 December 2015

अँधेरी खिड़कियों के अंदर का अँधेरा - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा / पहला उपन्यास  

अनिरुद्ध उमट 

अनिरुद्ध उमट उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने अपने कथा शिल्प को लेकर एक खास पहचान बनायी है पर उनके पहले उपन्यास अँधेरी खिड़कियाँ को पढ़ने से ऐसा लगता है कि उनके रचनाकर्म की खासियत उसका शिल्प नहीं वरन वह अनछुआ कथा-क्षेत्र है जो उनकी रचनात्मकता की पहचान भी है और उसकी ताकत भी। विवाह की दैविक अवधारणा को धवस्त कर स्त्री पुरूष को उनकी स्वतंत्र इयत्ता में देखने के अर्थों में यह उपन्यास बोल्डनहीं है क्योंकि यह विवाह को एक सामाजिक संविदा की तरह स्वीकार करने के उपरांत, सपना और यथार्थ की द्वंद्वात्मकता की पड़ताल करता है।

अँधेरी खिड़कियाँ में लेखक ने गोरी मेम का एक रूपक रचा है जो प्यार की दैहिक अभिव्यक्ति है। यह एक ऐसा सपना है जो बुढिया और उसके पति दोनों को अपनी जकड़न में लिए है। एक तरफ बुढिया का पति उसकी तरफ पीठ कर सोते हुए गोरी मेम की तस्वीर और उसके साथ स्वीमिंग पूल में नहाने का सपना देखते मर जाता है तो दूसरी तरफ बुढिया अपने बूढ़े कंठ में बिसरा दी गयी चहक से याद करती है कि उसकी माँ उसे गोरी मेम कहा करती थी। और फिर अपने पति के मरने के बाद वही बुढिया सोचती है कि उसके पति दरअसल गोरी मेम को भी नहीं चाहते थे, वे जानते ही नहीं थे कि उनका चाहना क्या है? बुढिया अंत तक यकीन करना चाहती है कि मरने से एक दिन पहले उसके पति उससे छुपकर उसी की तस्वीर देख रहे थे क्योंकि उन्हें हर काम छुप-छुप कर करने की आदत थी। इच्छाओं के भटकाव के बीच यह एक भोली आशा और प्यार को पाने की ललक ही है कि पति के पीठ कर सोने के बाद वह बुढिया भी एक करवट सोती रही ताकि कभी वे अपना चेहरा उसकी ओर करें तो उन्हें उसकी पीठ न मिले। कंडीशनिंगकी इस प्रक्रिया से बुढिया तभी मुक्त होती है जब उसका पुराना प्रेमी उसकी तलाश करता आता है जिसे वह अब भी गोरी मेम लगती है और इस तरह एक स्त्री के रूप में वह फिर रिड्यूसही होती है जबकि उस प्रेमी की पत्नी यह पूछते-पूछते मरती है कि क्या सचमुच कोई गोरी मेम की तरह लगती है?

इस तरह समाज की अँधेरी खिड़कियों का जो अँधेरा है वह भयानक और अराजक है जहां एक बुढिया की अदम्य वासना और अतृप्त कामना के जरिए उन स्थितयों की पहचान की गई है जो इनकी कारक हैं और लेखक के मैंका भटकाव इसी सन्दर्भ में है। बुढिया अपनी देह में इस तरह घिरी है कि अपने अस्तित्व की पहचान खो बैठी है और अपने भटकाव में इस तरह उलझी है कि वह लेखक से जानना चाहती है कि आधी रात के बाद उसके घर से जो रोने की आवाज आती है वह उसी की है या किसी और की? बुढिया के लिए यह अनस्तित्व से अस्तित्व की यात्रा है, और वह अपनी देह से तभी मुक्त होती है जब वह जान पाती है कि वह गोरी मेम नहीं है। विवाह रूपी संस्था में पवित्रता और अराजकता के बीच के अवकाश में प्रेम और वासना के द्वंद्व और उससे जूझ रहे स्त्री-पुरूष की तड़प और खासकर स्त्री की अपनी पहचान की बेचैनी को यह उपन्यास बहुत निर्मम तरीके से सामने रखता है।

उपन्यास की बुढिया का चरित्र स्मरणीय है और इन अर्थों में सम्पूर्ण कि अन्य  सारे पात्र उसी के चरित्र से अपनी ऊर्जा ग्रहण करते हैं। कहानी कहीं-न-कहीं वहऔर वेमें उलझ जाती है। कथ्य की जरूरत से परे जाकर भी जटिलता के प्रति रूझान कई बार कथ्य के विस्तार को बाधित और उसकी संभावना को क्षरित करता है। कुछ शब्दों के प्रति लेखक का मोह स्पष्ट झलकता है। जैसे पूरे उपन्यास में रोना हे मुक्ति है के अर्थों में गला फाड़नेका प्रयोग सौ से भी अधिक बार हुआ है और यह पढ़ते वक्त बहत खटकता है। कुल मिलाकर अँधेरी खिड़कियों के अंदर के अँधेरे की दास्तान को जानने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए।
 

पुस्तक परिचय: 
उपन्यास/अनिरुद्ध उमट.  कवि प्रकाशन, लखोटियों का चौक  बीकानेर - 334 005 प्रथम संस्करण: 1998. मूल्य: 90 रूपये.

Sunday, 27 December 2015

संवेदनाओं के द्वीप और विभ्रम की उलझनें - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा

विमलेश त्रिपाठी 

एक देश और मरे हुए लोगयुवा कवि विमलेश त्रिपाठी का दूसरा कविता संग्रह है. पूरा संग्रह पाँच खण्डों में विभाजित है- इस तरह मैं’, ‘बिना नाम की नदियाँ’, ‘दुःख-सुख का संगीत’, ‘कविता नहींऔर एक देश और मरे हुए लोग’. पाँचों खंड का एक अलग तेवर है और इसे पाँच स्वतंत्र कविता-संग्रह की तरह भी पढ़ा जा सकता है.

इस तरह मैंमें कविता की अभिव्यक्ति की उलझनें हैं तो बिना नाम की नदियाँमें कवि के उन आत्मीय संबंधों का संसार है जिससे वह और उसका व्यक्तित्व रचा गया है. दुःख- सुख का संगीतमें स्मृति और उम्मीद की कविताएँ हैं. कविता नहींकवि की आकांक्षाओं की कविता है तो पाँचवां खंड जिसमें संग्रह की शीर्षक कविता भी है कवि द्वारा यथार्थ को समझने की कोशिश है.

विमलेश त्रिपाठी संवेदना के कवि हैं. उनकी संवेदना ओढ़ी हुई नहीं है वरन् वह उनमें संस्कार की तरह विकसित हुई है. गांव और लोक की ललक उनकी कविताओं का मूल स्वर है. इसलिए उनकी कविताओं में जीवन में लगातार छूट रही चीजों के लिए एक बेचैनी स्पष्ट दिखती है और यथार्थ और स्मृति के बीच एक निरंतर आवाजाही संभव होती है.

कवि के अंदर अपने अस्तित्व की बेचैनी और अपने गांव से/ अपनी जड़ों से दूर रहकर शहर में प्रवासी हो जाने का दर्द बार-बार उनकी कविताओं में अभिव्यक्त होता है. यह एक बूढा हांफता गांवहै जिसकी याद कवि के मन में ऐसी बसी है कि वह कोलकाता में रहकर भी कोलकाता  का नहीं बन सका. यह जड़ों से कटने की पीड़ा है. यह उस गांव के नष्ट होते जाने का दर्द है जहां कुंए में मिट्टी भरती जा रही है.

कवि की प्रखर संवेदना उसकी कविता को अप्रतिम बनाती है. इसी संवेदना की ताकत से कवि बिना चिड़िया के पैरों में रस्सी बांधे और बिना नोह्पालिश से उसके पंख रंगे, उसे अपना बना लेता है. संवेदना कवि का घर है और जल ही जल चतुर्दिकमें उसके आश्रय का द्वीप भी.  
    
कवि को यह भय है कि जिस तरह दुनिया पक्षियों के माफिक नहीं रही उसी तरह एक दिन उसके रहने लायक भी नहीं रहेगी. पर यह कवि का विश्वास है कि वह कहता है-      
कोई लाख कोशिश कर ले
मैं कहीं जाऊंगा नहीं
रहूँगा मैं इसी पृथ्वी पर
बदले हुए रूप में.

विमलेश त्रिपाठी की कविताओं और उनकी कवि- समझ की यह ताकत है कि वे न केवल मनुष्य के अस्तित्व पर आसन्न खतरों की परख करते हैं वरन् उसके लिए एक निरंतर लड़ाई भी भाषा के स्तर पर लड़ते हैं. और उसके लिए वे खुशी-खुशी पूरे होश-ओ-हवास में मूर्खता का वरण करने को भी तैयार हैं. यहाँ मूर्खता अचानक सहजता का पर्याय बन जाती है. यह कवि का अपने पर विश्वास है. इसलिए वे कहते हैं-   
   
शब्द और कितने
फलसफे कितने और
इन दो के बीच फंसे
सदियों के आदमी को
निकालो कोई.
कलम बंद करो
मंच से उतरो
चलो इस देश की अंधेरी गलियों में
सुनो उस आदमी की बात
उसको भी बोलने का मौका दो कोई.

यह कविता में विचार और वाद से पहले  मनुष्य की स्थापना है. और इसलिए कवि कह पाता है, “जब कभी पुकारता कोई शिद्दत से/ दौड़ता मैं आदमी की तरह पहुँचता जहाँ पहुँचने की बेहद जरूरत.

बहनेंकविता एक महाकाव्य की तरह है और इसमें संवेदना का जो पारावार है उसे एक आलेख की सीमा में बांधना कठिन है. पूरी कविता में दुःख का और समाज में स्त्री जाति के प्रति हो रहे अन्याय का मद्धिम स्वर निरंतर गूंजता है और बहनों की कोई भी हँसी उसे ढंक नहीं पाती. यह कविता अपने आप में एक संपूर्ण वक्तव्य है. इसे पढ़ना दुःख के गीलेपन को महसूसना है जिसे हवा आँखों से सुखा देती है पर दिल के अंदर वह हमेशा रिसता रहता है. इसकी एक-एक पंक्ति समाज की आधी आबादी के साथ हमारे समय की नृशंसता का करुण दस्तावेज है. देखें-

इस तरह किसी दूसरे से नहीं जुड़ा था उनका भाग्य
सबका होकर भी रहना था पूरी उम्र अकेले ही उन्हें
अपने भाग्य के साथ.

स्त्री के इसी दुःख की सततता होस्टल की लड़कियांकविता में दिखती है जब कवि कहता है-
वे जीना चाहती हैं तय समय में
अपनी तरह की जिंदगी
जो उन्हें भविष्य में कभी नसीब नहीं होना.

यथार्थ और स्मृतियों के बीच जिस आवाजाही की बात मैंने पहले की है वह तीसरे खंड की कविताओं में साफ है. फिर चाहे वह सपनेकविता हो या बहुत जमाने पहले की बारिशया फिर ओझा बाबा को याद करते हुए’. ‘कविता नहींखंड की कविताएँ कवि के आकांक्षाओं की कविता है जहाँ वह अपनी उम्मीद की जड़ें तलाशता है. इसलिए कवि कहता है-

कविता में न भी बच सकें अच्छे शब्द
परवाह नहीं
मुझे सिद्ध कर दिया जाए
एक गुमनाम बेकार कवि.
कविता की बड़ी और तिलस्मी दुनिया के बाहर
बचा सका तो
अपना सब कुछ हारकर
बचा लूँगा आदमी के अंदर सूखती
कोई नदी
मुरझाता अकेला पेड़ कोई.

कविता संग्रह का समर्पण कवि के शब्दों में देश के उन करोड़ों लोगों के लिए है जिनके दिलों में अब भी सपने साँस ले रहे है और संग्रह के शुरुआती पन्ने पर कवि ने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पंक्तियों को याद किया है-

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम.
                              (गजानन माधव मुक्तिबोध)

संग्रह के पांचवें खंड का नाम है एक देश और मरे हुए लोगजिसमें इसी नाम की एक कविता भी है. चूँकि संग्रह का शीर्षक भी यही है इसलिए मैं मान लेता हूँ कि यह कवि की सबसे प्रिय  कविता है और इससे उसका सबसे अधिक वैचारिक जुड़ाव है.

एक देश और मरे हुए लोगजिसमें कवि का आग्रह है कि हकीकत को कथा की तरह और कथा को हकीकत की तरह सुना जाए, ‘भन्तेको संबोधित है. इस कविता में एक ऐसे राज्य का रूपक है जिसमें मंत्री, उसके कुनबे और जनता सब मरी हुई है पर राजा जिंदा है और मरी हुई जनता के बीच पहुँचाना चाहता है रोशनियाँ! मैंने इसको कई बार समझने की कोशिश की कि मुक्तिबोध की जिन पंक्तियों को कवि ने संग्रह में उद्धृत किया है उसमें देश मर जाता है और लोग बचे रहते हैं पर विमलेश जी की कविता में देश बचा है और लोग मरे हुए! अब क्या है यह? यथार्थ का अंतर्विरोध या कविता का विकास? इन मरे हुए लोगों के बीच कवि, लेखक कलाकार आदि कुछ ही लोग जीवित हैं. लोकधर्मी कवि की इस हठात आत्ममुग्धता का कारण क्या है? यह कौन सा यथार्थ है और कौन सा रूपक? जहां राजा जीवित है और तंत्र मरा हुआ! क्या है यह? बुराई का अमूर्तन? और आश्चर्य कि इस अमूर्तन को रचने वाली एक मशीन है जो बाहर से  आयात की गयी है जो जीवितों को लगातार मुर्दों में तब्दील  करती है. यानी यहाँ अमानवीकरण  एक प्रक्रिया नहीं है वरन् बाहर से आयातित है.

यहाँ कवि जो पूरी जनता के मरे होने का रूपक बांधता है क्या यह कवि की हताशा है? क्या यह वही कवि है जो इसी संग्रह में अपनी अंकुर के लिए कवितामें कहता है,

मेरे बच्चे मुझ पर नहीं
अपनी माँ पर नहीं
किसी ईश्वर पर भी नहीं
भरोसा रखना इस देश के करोड़ों लोगों पर
जो सब कुछ सहकर भी रहते हैं जिंदा.

तो ये करोड़ों लोग जो विमलेश त्रिपाठी की कविता में हर शर्त पर जिंदा रहते हैं अचानक मुर्दों में कैसे तब्दील हो गये? क्या अपने लोगों पर कवि का भरोसा डिग गया है? या यह एक दुस्वप्न  है, एक विभ्रम? इस विभ्रम की स्थिति में इस लोकधर्मी कवि, जो लोक के प्रति अपनी संवेदना से सिक्त है, की उम्मीद सिर्फ कवियों से हैं! और विश्वास कीजिये वैसे कवियों से  जो कवच-कुंडल लेकर महानता के साथ जनमते हैं! पर  विमलेश त्रिपाठी के ही शब्दों में क्या यही कवि अभी जोड़-तोड़ से पुरस्कार पाने में नहीं जुटे हुए थे. यह है विभ्रम की मुश्किलें!

कवि ने पूरी कविता को एक दुस्वप्न भरे रूपक की तरह रचने की कोशिश की है और इस कोशिश में उसका उस संवेदना से साथ छूट गया है जो कवि की ताकत है. संवेदना से इसी विलगाव के कारण गालियाँकविता में कवि गाली के पक्ष में तर्क देने लगता है उसे मन्त्र की तरह पवित्र ठहराने लगता है. इस  क्रम में वह गालियों की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने से चूक जाता है. वह भूल जाता है कि गालियाँ दी पुरूष को जाती हैं पर होती स्त्रियों के विरुद्ध  हैं कि स्त्रियों के विरूद्ध नृशंसता की यह वही सदियों पुरानी श्रृंखला है विमलेश जी की कविता जिनके खिलाफ है.

एक देश और मरे हुए लोगमें कवि की आख़िरी कोशिश उस मशीन की खोज है जो जिंदा लोगों को मुर्दा में तब्दील कर देती है. पर कवि यह भूल जाता है कि राजा इन मशीनों से पहले से थे और कविता भी, जो तब भी मनुष्य के अमानवीयकरण की प्रक्रिया से निरंतर लड़ रही थी. पर विभ्रम की मुश्किलों के बाहर विमलेश जी की कविताओं में संवेदनाओं के जो द्वीप हैं वहाँ जीवन का पर्यावरण सुरक्षित है और अपनी आदिम ऊर्जा से भरा साँस लेता है. 


पुस्तक परिचय: 
कविता संग्रह  कवि/ विमलेश त्रिपाठी.  प्रकाशक: बोधि प्रकाशनएफ -77, सेक्टर 9, रोड नं 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरियाबाईस गोदाम, जयपुर- 302006.   प्रकाशन वर्ष: 2013, प्रथम संस्करण. 

Thursday, 24 December 2015

क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है? - राकेश रोहित

आलेख
 
(हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री संजीव जी की कहानी 'आरोहण' पहली बार ‘हंस’अगस्त, 1996 में प्रकाशित हुई थी. यहाँ प्रस्तुत यह आलेख 'हंस' में 'आरोहण' कहानी के प्रकाशन के उपरांत 'हंस' के दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित हुआ था. यद्यपि इस आलेख में एक- दो जगह कुछेक परिवर्तन किये गए हैं इसके साथ आये संदर्भो को कृपया प्रकाशन वर्ष के साथ ही देखें.)

संजीव 

हिंदी कहानी पर विचार करते समय मैंने अक्सर यह समझना चाहा है कि मार्क्सवादी मॉडल के विखंडन और और तत्समय के आक्रामक उपभोक्तावाद के सचमुच के कठिन काल में हिंदी कहानी वह कौन-सा स्वरुप अख्तियार कर सकती है, जो उसकी रचनात्मक आँच के साथ-साथ उसकी प्रतिबद्धता को भी सुरक्षित रख पाने में संभव हो. इसके पहले मुझे कहने दीजिए कि हिंदी कहानी में वादाधारित कहानी का जो निर्विवाद दौर आया था, उसमें बाद में मार्क्सवाद की अधकचरी समझ और 'बिहारी' कहानीकारों का जो भी योगदान रहा हो, इसकी शुरुआत एक हद तक संजीव की 'अपराध' कहानी से हुई थी. 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' के दौर में प्रकशित इस कहानी में यद्यपि तत्कालीन विक्षोभ का प्रतिक्षेपण था पर इसने शायद उन फार्मूलों का भी विकास किया, जहाँ प्रतिबद्धता कहानी से अलग नंगी और कुरूप दिखती थी. यद्यपि 'आपरेशन जोनाकी', 'देवी सिंह कौन', 'सुधीर घोषाल', 'बिरजू तो मारा जायेगा' समकालीन कथा-यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं पर प्रतिबद्धतावादी कहानी की उत्तेजना का स्खलन विजयकांत की 'इंद्रजाल' जैसी कहानियों में साफ-साफ सामने आया. और आप अन्य लघु पत्रिकाओं की तो बात छोड़िये 'जन चेतना के प्रगतिशील कथा मासिक' उर्फ 'हंस' का प्रगतिशील जन भी लाल रंग, लाल सूरज वगैरह के प्रतीक-जाल में उलझा था या आदम-ईव के घेरे में आकर सिमटा था.

ऐसी कहानियाँ भी आईं, जो आजादी के बाद के भारतीय समाज व उसकी चुनौतियों की सच्ची समझ से लिखी गई थीं. पूरा याद करना कठिन हो फिर भी 'हिंगवा घाट में पानी रे', 'चिट्ठी', 'तिरिया चरित्तर', 'कहीं लौटा तो नहीं', 'शोक पर्व', 'अश्लील', 'पिंटी का साबुन', 'टुंड्रा प्रदेश', 'वे वहाँ कैद हैं', 'शामिल बाजा', 'गुप्तदान', 'क्रेमलिन टाइम', 'भैया एक्सप्रेस' आदि कहानियों को देखें. पर ये कहानियाँ अगर चर्चा में होने के बावजूद मुख्यधारा की कहानियाँ नहीं रहीं, तो उस जनवादी क्रांति के अघोषित युद्ध के विराम-काल में एक खामोश-सी कहानी 'आरोहण' (हंस, अगस्त, 1996) क्या हिंदी कहानी का कोई नया प्रस्थान-बिंदु है और क्या इसका श्रेय फिर से संजीव को ही दिया जाना चाहिए?

दिल पर हाथ रखकर बताइए तो जरा समूची हिंदी कहानी में भूप दादा जैसे कितने चरित्र याद आते हैं आपको? उसकी जिजीविषा मुझे अचानक 'भेड़िये' के खारू की याद दिलाती है, पर कितनी खामोश, कितनी निर्दोष. यह जो  भूप दादा का 'आत्मनिर्वासन' है वह निर्मल वर्मा के 'कौव्वे और काला पानी' के आत्मनिर्वासन से कितना अलग है क्योंकि वस्तुतः यह आत्मनिर्वासन है ही नहीं यद्यपि दिखता है. तभी तो भूप दादा इतने आत्मविश्वास से कह सकते हैं- "कौन कहता है अकेला हूँ, यहाँ माँ है, बाबा हैं, शैला है, सोये पड़े हैं सब. यहाँ महीप है, बल्द हैं, मेरी घरवाली है, मौत के मुँह से निकले गये खेत हैं, पेड़ हैं झरना है. इन पहाड़ों में मेरे पुरखों, मेरे प्यारों की आत्मा भटकती रहती है. मैं उनसे बात करता हूँ. मैं अकेला कहाँ हूँ." तो सचमुच के अकेलेपन और पहाड़-सी कठिन जिंदगी में यह जो अपने को अकेला न समझने की जिदभरी समझ है वही शायद इस आक्रामक समय में एक विचार को निरीह न समझने की हिम्मत पैदा कर सकती है. और सबसे मार्के की बात है कि आक्रामकता के विरुद्ध संघर्ष में अकेलेपन के बावजूद एक सदभाव है और वही इस संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति है. सोचिये, अकेलापन है, दुःख है, पर इसके बावजूद न घृणा है, न निरीहता है. एक संबल है सत् का, सही होने का- "(बात) नहीं की, दुःख था, लेकिन देवता जानते हैं जो कभी उनका बुरा सोचा हो मन में. यहाँ जहाँ हूँ, बुरा सोचूँगा भी कैसे? मुझे तो सभी पर दया आती है यहाँ से नीचे देखने पर." 

यह है आरोहण सत् का और सद् का!

जब मैं कहता हूँ कि 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है तो मेरा मकसद एक नये चरित्र की स्थापना या तलाश से ही निष्कर्ष निकाल लेने की सुविधा का नहीं है बल्कि मेरा जोर यह मानने पर है कि यह कहानी हिंदी कथा-परंपरा के 'डी-स्कूलिंग' का भी सूचक है. न केवल इस मायने में कि यह संजीव की अपनी पूर्व की कहानियों से इतर है बल्कि इसलिए भी कि यह कहानी शायद पहली बार उस  भाषा में लिखी गयी है जहाँ अब तक के अछूत समझे गये विषय, अस्तित्व के संकट की समझ जनवादी तरीके से होती है. ऐसे परिवेश की कल्पना कीजिये, जहाँ के लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन हो कि सरकार पर्वतारोहणके लिए भी पैसा दे सकती है वहाँ अगर संजीव अस्तित्व जैसे कठिन सार्त्रीय विषय की जगह बना लेते हैं, तो इतना तय है कि संजीव ने फिर एक नये कथा-क्षेत्र की सफल तलाश कर ली है. 'तिड़बेनी का तड़बन्ना' से 'आरोहण' तक की यह यात्रा केवल संजीव की यात्रा नहीं वरन हिंदी कहानी की भी यात्रा है.


ऐसी स्थिति में, जब अधिकतर हिंदी कविता पर एक तय और सर्वमान्य पाठ्यक्रम का प्रभाव साफ दिखता है हिंदी कहानी की यह 'डी-स्कूलिंग' सुखकर भी है और महत्वपूर्ण भी. हिंदी कविता की यह बहुत बड़ी विडंबना है कि जिसने आज के तनाव भरे और आतंककारी समयानुकूल भाषा का विकास मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के दौर में ही कर लिया था, आज के समय में छायालोक की लिजलिजी और दुहरावभरी भाषा में बात करती है. समय का तनाव जो मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने अपने समय में अकेले जिया था, वही आज हम सामूहिक रूप से जी रहे हैं, पर हमारी कविताओं में  उस खुरदुरी, चुभने वाली और यथार्थ से आँख मिलाने वाली  भाषा का अभाव दिखता है. तो देखिए, अब तक हम निर्विवाद मानते आये थे कि कविता अपने समय की ज्यादा स्फूर्त प्रतिक्रिया करती है और कहानी पकने में समय लेती है पर इस बार क्या करें अगर हम पाते हैं कि कविता ने अपनी एक तय विषय-सूची बना रखी है, तो कहानी नये संकट से नये अंदाज से जूझती है, नई भाषा के साथ? अगर आप यह मान लेते हैं कि कुछ नये की तलाश की निर्दोष कामना में कविता 'स्कूल्ड' होती जा रही है, जबकि कहानी ने, देर से ही सही, 'डी-स्कूलिंग' की जरूरत को समझा है तो आप मान लेंगे कि 'आरोहण' वाकई हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है. 
                              
                              (तस्वीर गूगल से साभार)

Wednesday, 23 December 2015

वे तितली नहीं मांग रहीं... - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा 

कृष्णा सोबती 


एक रचना कहीं-न-कहीं अस्तित्व की तलाश होती है क्योंकि केवल व्यतीत के पुनर्जीवन में रचना की संपूर्णता की समाई नहीं होती पर यह स्थिति और महत्वपूर्ण हो जाती है जब एक रचना 'जो है' की तलाश से आगे बढ़ कर 'नहीं होने' का होना संभव करती है। यह अस्तित्व के आविष्कार की वह प्रक्रिया है जो इस नष्ट होती दुनिया में उन घरौंदों की रचना करती है जिसमें सदियों से संतप्त दिल अनंत जिजीविषा से आज भी धड़कते हैं। इस पुराने दिल की ताजी धडकनों की जो उत्तेजना 'मित्रो मरजानी' में प्रकट हुई थी वह एक पवित्र गरमाहट की तरह 'ऐ लड़की' में मौजूद है।
'ऐ लड़की' के साथ कृष्णा सोबती जी का नाम अभिन्न रूप से जुड़ा है तो इसके मूल में यह है कि महाविशेषांक के दौर में 'ऐ लड़की' कहानी एक साथ पाठकों से लेकर नये- पुराने लेखकों की टिप्पणियों के केंद्र में रही है। इनमें से कुछ को याद करना संदर्भ के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। संजीव इसे 'केवल जीभ व विकलांगता के अबसेशन' में सीमित करने को इच्छुक थे तो सृंजय ने एक मजेदार टिप्पणी की- "रौंदी गयी फसलों के बीच ऐ लड़की का बिजूका।" रमेश उपाध्याय ने 'इलाहाबादी लेखक त्रय' द्वारा 'ऐ लड़की' को 'बेजोड़, अद्भुत और कालजयी' बताने को "प्रायोजित चर्चा के प्रवर्तन का अप्रतिम उदाहरण" ठहराते हुए लिखा- " उन्होंने सिर्फ एक कहानी (महाविशेषांक में) पढ़ी और उसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया।" "हिंदी कहानी का जनतंत्र" (पहल-42) में स्वयंप्रकाश ने 'ऐ लड़की' को अंक (महाविशेषांक) की सबसे कमजोर कहानी ठहराते हुए सवाल उठाया कि क्या लेखिका में इतना साहस है कि वह पाठकों को बताए कि यह कहानी है या लघु उपन्यास? पर महाविशेषांक के संपादक उस समय यह बताने में व्यस्त रहे कि किस तरह एक पाठक 'ऐ लड़की' को पढ़कर इतना डर गया कि वह गायत्री मंत्र का जाप करने लगा!
कहानी और उपन्यास के रूप में प्रकाशन के इतने वर्ष बाद आज इसे कुछ निरपेक्ष ढंग से समझने की जरूरत फिर इसलिए है कि यह कहानी उस छद्म से मुक्त है जिस छद्म से रची गयी उस काल की कई 'कालजयी' कहानियां आज पुरानी पड़ चुकी हैं। पर जो खुद पुराना है वह पुराना कैसे पड़ेगा! इसमें कुछ नया नहीं है अगर एक मर रही बूढ़ी माँ मरते समय बीते वक्त की जुगाली करती हुई अविवाहित मंझली बेटी की चिंता में घुली जा रही है या नर्स सूसन जो इस जीवन में समान रूप से शरीक होते हुए भी जैसे कथा से निरपेक्ष है। 'ऐ लड़की' में अम्मू कहती है, "नींद में जैसे कोई बारिश की आवाज सुनता है न ऐसे ही कोई बीता वक्त सुन रही हूँ।" पर अगर कहानी को केवल इसी बिन्दु पर रिड्यूस करके देखने से अलग आप तैयार हों तो इस कहानी को अस्तित्व के अंत:संचरण के रूप में समझा जाना चाहिए जहाँ माँ और लड़की के अस्तित्व का परस्पर एक दूसरे में घुलना है।
'ऐ लड़की' में माँ अपनी जीवन- स्मृति लड़की में खोलती है और इस तरह जीने की इच्छा का आवाहन करती है- "तुम्हें बार-बार बुलाती हूँ तो इसलिए कि तुमसे अपने लिए ताकत खींचती हूँ।" और इस तरह उस अनुभव को छू पाती है- "मैं तुमलोगों की माँ जरूर हूँ पर तुमसे अलग हूँ। मैं तुम नहीं और तुम मैं नहीं। मैं मैं हूँ।" पर इस अनुभव को पाने के पहले वे एक परकाया प्रवेश जैसी चीज से गुजरती हैं, वह है एक दूसरे को पाना। लड़की से बात करती हुई माँ उसके खीझने पर कहती है- "मैं तुम्हें खिझा थोड़े रही हूँ। सखि सहेलियां भी ऐसी बातें कर लेती हैं।" यही माँ द्वारा लड़की को एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में पाने की विनम्र प्रक्रिया है। परिवार और अकेलेपन के दो ध्रुवों के बीच स्त्री की सनातन नियति से विद्रोह के रूप में ही इस कहानी के नये अर्थ बनते हैं। अम्मू जो एक भरा- पूरा पारिवारिक जीवन जी चुकी है जीवन छोड़ने सा पहले उन ऐषणाओं को याद करती है जो उसकी अपनी मुक्ति के लिए आवश्यक था पर परिवार के पुरानिर्मित सांचे में जिसकी जगह नहीं बन सकी। शिमला की यात्रा के बहाने कृष्णा सोबती ने बार-बार अम्मू के बनने से रह जाते स्व को पकड़ने की कोशिश की है। जब अम्मू शिमला सफर के दौरान पति से कहती है, "मेरा फैसला है मुझे चक्कर नहीं आना चाहिए तो आएगा कैसे!" तो महसूसती है, "जाने क्या था, सहज भाव से कही यह बात हम दोनों के बीच बहुत देर तक पड़ी रही।" यह अम्मू के बहाने एक स्त्री की कंडीशनिंग की प्रक्रिया की पहचान है जिसकी विवश अभिव्यक्ति जीवन के निर्मोह क्षणों में होती है- "इस परिवार को मैंने घड़ी मुताबिक चलाया पर अपना निज का कोई काम न संवारा। चाहती थी पहाड़ियों की चोटियों पर चढ़ूं। शिखर पर पहुंचूं। पर यह बात घर की दिनचर्या में कहीं न जुड़ती थी।" इसी बेचैनी से वह कहती है- "मैं तितली नहीं मांग रही, अपना हक मांग रही हूँ।"
लड़की जो इस कथा में सायास शामिल है अपने अस्तित्व के प्रति पूर्णतया सजग है। और ऐसा पहली बार है कि लड़की जो जिंदगी अपने लिए चुनती है उसके स्वीकार से बचती नहीं है और मुझे कहने दीजिए, सारी कथा इसी अस्तित्व की आश्वस्ति की परख करती है। यह सारी कहानी परिवार में पुरुष की स्थापित भूमिका से विद्रोह का वाचन है। अम्मू, लड़की से लेकर सूसन तक सभी अपनी भूमिका में कुछ नया जोड़ने को व्यग्र हैं और यह अनायास नहीं है कि पुरुष- व्यवहार के प्रतीक पिता और बेटा इस कथा में अनुपस्थित पात्र हैं। बात वहाँ साफ होती है जब अम्मू लड़की से कहती है- "सुनो, बेटा- बेटियां, नाती- नातिन, पुत्र- पौत्र मेरा सब परिवार सजा हुआ है, फिर भी अकेली हूँ। और तुम! तुम उस प्राचीन गाथा से बाहर हो, जहाँ पति होता है, बच्चे होते हैं, परिवार होता है। न भी हो दुनियादारी वाली चौखट, तो भी तुम अपने आप में तो आप हो। लड़की अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है।" इसलिए अम्मू जब लड़की के कमरे में जाकर सिगरेट पीती है तो यह लड़की की जीवनशैली के प्रति उसका स्वीकार है जिसको लेकर वह अब तक सशंकित बनी हुई दिखती रही है। यहाँ पारंपरिक मान्यताओं से अस्तित्व की टकराहट की स्पष्ट गूंज है। उन मान्यताओं से जिसके अधीन आखिरी बीमारी में नाना पास खड़ी बेटियों को आवाज नहीं देते हैं। माँ भी इस मान्यता की ओर लौटती है। वह मृत्यु के अंतिम क्षण कहती है- "लड़की अपने भाई को आवाज दो। उसे जल्दी बुला लो। खूंटे पर से मेरा घोड़ा खोल देगा। उसे समुद्र पार दौड़ा ले जाऊंगी मैं!" और लड़की माँ का हाथ छूकर उसे डुबकी ले नहा लेने को कहती है। वह अब आश्वस्त है माँ के अस्तित्व के प्रति कि माँ ने उसे 'डिसकवर' कर लिया है।

"दिलो-दानिश" कृष्णा सोबती जी का प्रसिद्ध उपन्यास है। बीसवीं सदी के वक्त को समेटती यह कथा अपने चुस्त संवादों के बल पर क्लासिक का स्वाद देती है। कथा वाचन के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रयोग यह है कि प्रत्येक दृश्य का वाचक वह कथा- पात्र है, घटना अनुभूति के स्तर पर जिसके सबसे करीब घट रही होती है।
"दिलो-दानिश" के फ्लैप पर इसे प्रेम और परिवार के दो ध्रुवों के बीच जिंदगी की बरकतों को नवाजती छोटी- बड़ी हस्तियों के कायदे- करीने के रूप में देखने की कोशिश की गयी है। पर मुझे यह सही नहीं लगता है क्योंकि इस परिवार की कथा का दूसरा ध्रुव प्रेम पर नहीं टिकता है। कृपानारायण वकील साहब थोड़ी देर के लिए यह जरूर महसूस लें कि फर्क चाहने में नहीं चाहत में है पर महक को लेकर यह भी उन्हीं की सोच है और ज्यादा साफ है- "महक के यहाँ न वायदों के टंटे- बखेड़े हैं न झूठी- सच्ची जफाओं और वफाओं के। वक्त के लिए वक्त की खुशनुमाई ही तो। महक जैसी औरत भला हम पर क्या हावी होगी। चल रही है क्योंकि चल निकली है।" फराखदिल वकील साहब के लिए तो यह ढंग की चाहत भी नहीं है। भला इसे प्रेम में किस तरह बांधें?
क्या ऐसा नहीं है कि यह उपन्यास व्यक्तित्व विभाजन की नियति पर टिका है? यह नियति उस संयुक्त परिवार के विघटन की डिमांड उत्पन्न करती है जो सामंतवादी ढांचे के आधार की तरह फल- फूल रहा है। यह व्यक्तित्व विभाजन वकील साहब का भी है पर इससे पहले और ज्यादा जरूरी तौर पर कुटुंब का है, बउवाजी और छुन्ना बीबी का है। वकील साहब के लिए यह ओढ़ी हुई स्थिति है। वे जो कुटुंब और महक के बीच बंटे हुए दिखते हैं यही उनका सुख है जिसका चयन उनका पुरुष- गौरव है। बउवाजी इसके बारे में कहती हैं- "हमसे पूछो तो मर्द को गुमराह करनेवाले फकत हुस्न और जवानी नहीं उसकी कमाई है जो उसे खुदमुख्तारी देती है।" वकील साहब के इस पुरुष- गौरव की अभिव्यक्ति अपने भदेस रूप में वहाँ होती है जब वह महक बानो की जवाब तलबी पर खीझकर खौलते हैं, "दिल में आया इसकी जांघों को रौंद डालें।" पर महक अपने व्यक्तित्व को विभाजित होने से बचाये हुए है। यह उसकी अपने अस्तित्व के प्रति सचेतनता है। वह वकील साहब के साथ भी है और वकील साहब के बिना भी... पूर्ण! यही उसका नायिका तत्व है जो कुटुंब, बउवाजी से लेकर छुन्ना बीबी के समंजन के विरुद्ध चैलेंजिंग है।
छुन्ना बीबी भुवन से आर्य समाज में शादी कर उस यथास्थिति को भंग करती है जिसके बारे में बउवाजी का नियतिवादी दृष्टिकोण है- "कुछ बदलने वाला नहीं। जो हो रहा है उसे नजरअंदाज करो। सुनो बहू! शादी के पहले सालों में हम जब- जब पीहर जाते माँ से लगकर खूब रोते। पर अम्मां ने हमें कभी न पूछा कि बिटिया बात क्या है। हर बार थपथपाकर यही कहे- आओ चलो मुंह धो लो।"
प्रसंगवश बउवाजी और उनकी अम्मा की तुलना 'ऐ लड़की' के अम्मू और लड़की से कीजिए। इस संवाद विरलता की स्थिति से आगे 'ऐ लड़की' की लड़की सघन संवाद करती अम्मू के समक्ष अपने निर्णय और स्थिति को लेकर कितनी दृढ़ और आश्वस्त है! चूंकि 'ऐ लड़की' पहले की रचना है तो संभवतः कृष्णा सोबती जी ने 'दिलो दानिश' लिखकर यह बताना जरूरी समझा कि 'ऐ लड़की' की लड़की किस स्थिति से चलकर यहाँ तक पहुंची है!
कुटुंब का व्यक्तित्व वहाँ विभाजित होता है जब वह अपने स्व को महक में बदलने की ललक से भरी नजर आती है। वहाँ वकील साहब पर अपने अधिकार की चिंता अपने अस्तित्व को लेकर सचेतनता से अधिक महक से प्रतियोगिता की है। और जब वह वकील साहब के साथ महक के यहाँ कंगन मांगने जाती है तो यह उसका रिड्यूस होना है। क्योंकि जो महक के पास उसका अपना है उसे कौन छीन सकता है! कुटुंब वहीँ बड़ी दिखाई देती है जहाँ वह वकील साहब की निरंकुश स्वतंत्रता (मुझे शराब पिला और यह कहकर पिला कि यह शराब है। अब छिपकर न पिला इसलिए कि अब खुलकर पीना मुमकिन है।) के गौरव से लड़ती हुई सवाल करती है- "जहाँ तक आप लोगों का सवाल है उन्हें तो बदलने की जरूरत ही नहीं।" पर ऐसे स्थल थोड़े हैं जहाँ कुटुंब अपनी स्त्री होने की इयत्ता को संरक्षित रखती नजर आती है। जबकि महक इसे लेकर पूरे तौर पर सतर्क है। अपने अस्तित्व पर संकट के क्षण, जब वह महसूसती है- "रेत में पांव धंसे जाते हैं। तपती धूप और रेगिस्तान। दीख रही है यही दो झाड़ियां और वह भी वकील साहब की हुई।" - बेटी के विवाह रूकने का बड़ा खतरा उठाकर जिस तरह वकील साहब से जिरह करने को उद्धत होती है वह उसका अपनी सत्ता के प्रति सचेतन होना ही है। इसमें संदेह नहीं कि यह सचेतनता महक को वह गौरव देती है जो उसे हिंदी कथा पात्रों में अविस्मरणीय बनाती है। यह महक का अपनी तय भूमिका से बाहर निकलना और उसके स्व की पुनर्रचना है। महक अपने कद की हो जाती है जब वह खुद को जान लेती है- "आज से पहले तो हम औरत नहीं थे। ओढ़नी थे, अंगिया थे, सलवार थे।" वे जेवर जिनके लिए नसीम बानो ने खून कर दिया था और जिसे वकील साहब ने अपने पास रख रखा था, माँ के उस जेवर की मांग महक के पहचान की मांग है जिसके लिए उसकी माँ उम्र भर लड़ती रही और वह जेवर पहनते ही उसका खानदानी स्वरूप उतर आया ऐसे जैसे दुनिया को पछाड़कर खड़ी हो गयी हो। और जैसा कि कृष्णा सोबती लिखती हैं- वे तितली नहीं मांग रहीं....