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Sunday, 10 January 2016

मनुष्य की नियति का समय - राकेश रोहित

आलेख
संदर्भ: भुवनेश्वर की कहानी 'भेड़िये'

('भेड़िये' पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की 'हंस', मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी "नयी कहानी की पहली कृति 'भेड़िये' ” से आरंभ बहस के क्रम में 'बीच बहस में' 'हंस' सितंबर, 1991 में "मनुष्य की नियति का समय" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. 'हंस' के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी "भेड़िये और भेड़िये" में डा. शुकदेव सिंह  ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में 'संदर्श' के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में 'हंस' से साभार प्रकाशित हुई थी.) 


भुवनेश्वर

भुवनेश्वर  की  भेड़िये’  कहानी को वहां से समझा जाना  चाहिए जहां यह मनुष्य की नियति के समय को पकड़ने के क्रम में वैयक्तिक त्रासदी को मानवीय महात्रास में बदल देती है.  इफ्तखार के बहाने एक पीढ़ी या कहिये एक वर्ग के उस जीवन दर्शन को समझा जा सकता है जिससे वह अपनी नियति को उस समूह की नियति से अलग कर लेता है जो समान रूप से उसकी भी है. इस तरह वह एक अंतर्विभाजन रचता है और चीजों की प्राथमिकता उनकी उपयोगिता से तय करता है. यहीं से कुछ को कुछ से कमतर और कुछ को कुछ से बेहतर समझने की मानसिकता जन्म लेती है जिसके अधीन वह टिप्पणी करता है- पूरे बंजारों में उसका गड्डा अफसर था. यह एक असमानता का श्रेष्ठवादी दर्शन है जहां भेड़िये के खिलाफ लड़ाई को वह अपने बचे रहने की जद्दोजहद से जोड़ता है. तब उसे बैल उतने ही चाहिए जो गाड़ी दौड़ा ले जा सकें, नटनियां तभी तक जब तक वह गाड़ी पर बोझ न हों. यहीं कहीं वह उस प्रेम को नकारता है जिसे उसने एक क्षण बचा रखा था और बादी के बदले दूसरी  नटनियां को कूदने के लिये कहा था. यह एक किस्म की प्रतिहिंसा थी जो हिंसा को जन्म देती है. वह प्रेम को उसके सिरे से नकारने की चेष्टा करता है, "तुम खुद कूद पड़ोगी या मैं तुम्हें धकेल दूं." और नटनियां उसी तर्ज पर चांदी की नथ उतार कर बाहों से आंखें बंद किये कूद जाती है. दरअसल यह प्रेम का वह ठहरा हुआ खास क्षण है जो इस नष्ट होते समय में बचा है. इफ्तखार को शायद शंका होती है कि बादी को वह कूदने के लिये नहीं कह सकेगा या शायद बादी ही उस पर भरोसा किये हो कि वह उसे बचा लेगा. इस तरह प्रेम उसके अन्दर की कमजोरी बन जाता है जो उसके अपने होने की शर्त  के विरुद्ध जाता  है. वह इससे निजात पाने के लिये अपनी झिझक के ऊपर यह कहने का साहस करता है, "तुम खुद कूद पड़ोगी या ...." यह एक क्रूर किस्म का व्यक्तिवाद है. बादी इसका प्रत्युत्तर है. वह चांदी की नथ उतारकर उसके हाथों में दे देती है जैसे आभास दे रही हो कि वह इसी के लिये रुकी थी. इस तरह वह अपने अन्दर के प्रेम का अंत करती है और बाहों से आंखें बंद किये अपनी नियति को स्वीकृत करती है. वह इफ्तखार के पिता की तरह कोई निर्देश नहीं देती कि वह उसके मरने के बाद उसके जूते नहीं पहने यद्यपि वो नये हैं. बादी का यह कूद पड़ना रीतिकालीन प्रेम के उत्सर्ग की नैतिकता नहीं रचता है. बल्कि एक झटके से वह अपनी उस स्थिति का संकेत करती है जो उस वक्त उसकी है और जिस असमान नैतिकता ने प्रेम का अंत कर दिया है जैसे प्रेम था ही नहीं.

पर नियंता होने के दंभ ओढ़े इफ्तखार अपनी नियति को स्वीकार नहीं करता, वह अपने को 'एलियनेट' करता है. धीरे-धीरे वह सबको अपने से काटता है और एक खोखला आश्वासन ओढ़े रहता है कि अगर जिन्दा रहा तो  मैं एक-एक  भेड़िया काट डालूंगा. यह उसका आत्मस्वीकार है कि सारा व्यापार मात्र उसके जिन्दा रहने के लिये है. इफ्तखार कूद पड़ता है कि उसकी जिंदगी थोड़ी है. वह अपने अस्तित्व को 'डाइल्यूट' कर जिंदगी को एक यूनिट बनाता है. और मृत्यु को विवश अंगीकार करता है क्योंकि उसकी जिंदगी अपने बेटे की जिंदगी से 'श्रेष्ठ' नहीं है. वह अपने रचे दर्शन से अपनी स्थिति को परिभाषित करता है और पाता है. यही वह क्षण है जहां आप त्रास रचते भी हैं और उसमें शामिल भी होते हैं. धीरे-धीरे वह सारा अंतर मिट जाता है जो आपमें था, जो आपमें नहीं है. इफ्तखार के पिता में जीने का मोह था और बहाना भी. वह बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था. वह अपने भाव की दुनिया रचता है - मारते-मरते मैं कह चलूंगा खारे-सा-खरा कोई निशानेबाज नहीं है. वह अपने जूते को लेकर कहता है, अगर मैं जिन्दा रहता तो दस साल और पहनता. इस तरह दस साल वह संबंध  और रहता जो खरे और उसके बाप के बीच था. लेकिन इफ्तखार के पिता ने खुद को न्यूनीकृत कर लिया.

इफ्तखार अपने सतत 'एलियनेशन' से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे 'खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता हैनटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, "भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे." इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है 'जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं'. यह संवेदना का एक 'क्लोज सर्किट' है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.  
      
पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के बाद खारु में बदल जाता है. यह उसकी उस छद्म वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.

Thursday, 24 December 2015

क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है? - राकेश रोहित

आलेख
 
(हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री संजीव जी की कहानी 'आरोहण' पहली बार ‘हंस’अगस्त, 1996 में प्रकाशित हुई थी. यहाँ प्रस्तुत यह आलेख 'हंस' में 'आरोहण' कहानी के प्रकाशन के उपरांत 'हंस' के दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित हुआ था. यद्यपि इस आलेख में एक- दो जगह कुछेक परिवर्तन किये गए हैं इसके साथ आये संदर्भो को कृपया प्रकाशन वर्ष के साथ ही देखें.)

संजीव 

हिंदी कहानी पर विचार करते समय मैंने अक्सर यह समझना चाहा है कि मार्क्सवादी मॉडल के विखंडन और और तत्समय के आक्रामक उपभोक्तावाद के सचमुच के कठिन काल में हिंदी कहानी वह कौन-सा स्वरुप अख्तियार कर सकती है, जो उसकी रचनात्मक आँच के साथ-साथ उसकी प्रतिबद्धता को भी सुरक्षित रख पाने में संभव हो. इसके पहले मुझे कहने दीजिए कि हिंदी कहानी में वादाधारित कहानी का जो निर्विवाद दौर आया था, उसमें बाद में मार्क्सवाद की अधकचरी समझ और 'बिहारी' कहानीकारों का जो भी योगदान रहा हो, इसकी शुरुआत एक हद तक संजीव की 'अपराध' कहानी से हुई थी. 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' के दौर में प्रकशित इस कहानी में यद्यपि तत्कालीन विक्षोभ का प्रतिक्षेपण था पर इसने शायद उन फार्मूलों का भी विकास किया, जहाँ प्रतिबद्धता कहानी से अलग नंगी और कुरूप दिखती थी. यद्यपि 'आपरेशन जोनाकी', 'देवी सिंह कौन', 'सुधीर घोषाल', 'बिरजू तो मारा जायेगा' समकालीन कथा-यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं पर प्रतिबद्धतावादी कहानी की उत्तेजना का स्खलन विजयकांत की 'इंद्रजाल' जैसी कहानियों में साफ-साफ सामने आया. और आप अन्य लघु पत्रिकाओं की तो बात छोड़िये 'जन चेतना के प्रगतिशील कथा मासिक' उर्फ 'हंस' का प्रगतिशील जन भी लाल रंग, लाल सूरज वगैरह के प्रतीक-जाल में उलझा था या आदम-ईव के घेरे में आकर सिमटा था.

ऐसी कहानियाँ भी आईं, जो आजादी के बाद के भारतीय समाज व उसकी चुनौतियों की सच्ची समझ से लिखी गई थीं. पूरा याद करना कठिन हो फिर भी 'हिंगवा घाट में पानी रे', 'चिट्ठी', 'तिरिया चरित्तर', 'कहीं लौटा तो नहीं', 'शोक पर्व', 'अश्लील', 'पिंटी का साबुन', 'टुंड्रा प्रदेश', 'वे वहाँ कैद हैं', 'शामिल बाजा', 'गुप्तदान', 'क्रेमलिन टाइम', 'भैया एक्सप्रेस' आदि कहानियों को देखें. पर ये कहानियाँ अगर चर्चा में होने के बावजूद मुख्यधारा की कहानियाँ नहीं रहीं, तो उस जनवादी क्रांति के अघोषित युद्ध के विराम-काल में एक खामोश-सी कहानी 'आरोहण' (हंस, अगस्त, 1996) क्या हिंदी कहानी का कोई नया प्रस्थान-बिंदु है और क्या इसका श्रेय फिर से संजीव को ही दिया जाना चाहिए?

दिल पर हाथ रखकर बताइए तो जरा समूची हिंदी कहानी में भूप दादा जैसे कितने चरित्र याद आते हैं आपको? उसकी जिजीविषा मुझे अचानक 'भेड़िये' के खारू की याद दिलाती है, पर कितनी खामोश, कितनी निर्दोष. यह जो  भूप दादा का 'आत्मनिर्वासन' है वह निर्मल वर्मा के 'कौव्वे और काला पानी' के आत्मनिर्वासन से कितना अलग है क्योंकि वस्तुतः यह आत्मनिर्वासन है ही नहीं यद्यपि दिखता है. तभी तो भूप दादा इतने आत्मविश्वास से कह सकते हैं- "कौन कहता है अकेला हूँ, यहाँ माँ है, बाबा हैं, शैला है, सोये पड़े हैं सब. यहाँ महीप है, बल्द हैं, मेरी घरवाली है, मौत के मुँह से निकले गये खेत हैं, पेड़ हैं झरना है. इन पहाड़ों में मेरे पुरखों, मेरे प्यारों की आत्मा भटकती रहती है. मैं उनसे बात करता हूँ. मैं अकेला कहाँ हूँ." तो सचमुच के अकेलेपन और पहाड़-सी कठिन जिंदगी में यह जो अपने को अकेला न समझने की जिदभरी समझ है वही शायद इस आक्रामक समय में एक विचार को निरीह न समझने की हिम्मत पैदा कर सकती है. और सबसे मार्के की बात है कि आक्रामकता के विरुद्ध संघर्ष में अकेलेपन के बावजूद एक सदभाव है और वही इस संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति है. सोचिये, अकेलापन है, दुःख है, पर इसके बावजूद न घृणा है, न निरीहता है. एक संबल है सत् का, सही होने का- "(बात) नहीं की, दुःख था, लेकिन देवता जानते हैं जो कभी उनका बुरा सोचा हो मन में. यहाँ जहाँ हूँ, बुरा सोचूँगा भी कैसे? मुझे तो सभी पर दया आती है यहाँ से नीचे देखने पर." 

यह है आरोहण सत् का और सद् का!

जब मैं कहता हूँ कि 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है तो मेरा मकसद एक नये चरित्र की स्थापना या तलाश से ही निष्कर्ष निकाल लेने की सुविधा का नहीं है बल्कि मेरा जोर यह मानने पर है कि यह कहानी हिंदी कथा-परंपरा के 'डी-स्कूलिंग' का भी सूचक है. न केवल इस मायने में कि यह संजीव की अपनी पूर्व की कहानियों से इतर है बल्कि इसलिए भी कि यह कहानी शायद पहली बार उस  भाषा में लिखी गयी है जहाँ अब तक के अछूत समझे गये विषय, अस्तित्व के संकट की समझ जनवादी तरीके से होती है. ऐसे परिवेश की कल्पना कीजिये, जहाँ के लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन हो कि सरकार पर्वतारोहणके लिए भी पैसा दे सकती है वहाँ अगर संजीव अस्तित्व जैसे कठिन सार्त्रीय विषय की जगह बना लेते हैं, तो इतना तय है कि संजीव ने फिर एक नये कथा-क्षेत्र की सफल तलाश कर ली है. 'तिड़बेनी का तड़बन्ना' से 'आरोहण' तक की यह यात्रा केवल संजीव की यात्रा नहीं वरन हिंदी कहानी की भी यात्रा है.


ऐसी स्थिति में, जब अधिकतर हिंदी कविता पर एक तय और सर्वमान्य पाठ्यक्रम का प्रभाव साफ दिखता है हिंदी कहानी की यह 'डी-स्कूलिंग' सुखकर भी है और महत्वपूर्ण भी. हिंदी कविता की यह बहुत बड़ी विडंबना है कि जिसने आज के तनाव भरे और आतंककारी समयानुकूल भाषा का विकास मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के दौर में ही कर लिया था, आज के समय में छायालोक की लिजलिजी और दुहरावभरी भाषा में बात करती है. समय का तनाव जो मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने अपने समय में अकेले जिया था, वही आज हम सामूहिक रूप से जी रहे हैं, पर हमारी कविताओं में  उस खुरदुरी, चुभने वाली और यथार्थ से आँख मिलाने वाली  भाषा का अभाव दिखता है. तो देखिए, अब तक हम निर्विवाद मानते आये थे कि कविता अपने समय की ज्यादा स्फूर्त प्रतिक्रिया करती है और कहानी पकने में समय लेती है पर इस बार क्या करें अगर हम पाते हैं कि कविता ने अपनी एक तय विषय-सूची बना रखी है, तो कहानी नये संकट से नये अंदाज से जूझती है, नई भाषा के साथ? अगर आप यह मान लेते हैं कि कुछ नये की तलाश की निर्दोष कामना में कविता 'स्कूल्ड' होती जा रही है, जबकि कहानी ने, देर से ही सही, 'डी-स्कूलिंग' की जरूरत को समझा है तो आप मान लेंगे कि 'आरोहण' वाकई हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है. 
                              
                              (तस्वीर गूगल से साभार)